सेना चिकित्सा कोर स्थापना दिवस (Army Medical Corps Establishment Day) की शुरुआत क्यों हुई

जहां एक ओर दुनिया सैनिको को "लौह पुरुष" के रूप में देखा जाता है वहीं दूसरी ओर वे आम लोगों की तरह ही बीमार पड़ते है। युद्धभूमि में घायल होते है लेकिन सेना के चिकित्सक उन्हें नया और स्वस्थ जीवन देते है और उन्हें फिर से खड़े होने के लिए तैयार करते है। क्योंकि केवल एक चुस्त-दुरुस्त सिपाही ही जमीन पर, आकाश में अथवा समुद्र में अगले दिन युद्ध करने के लिए जीवित रह सकता है। आज हमे आपको इस लेख में बताएँगे सेना चिकित्सा कोर Army Medical Corps से जुडी कुछ खास बातें। 

Army Medical Corps Establishment Day
Army Medical Corps Establishment Day

सेना चिकित्सा कोर (Army Medical Corps) की शुरुआत कैसे हुई?

सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन 1745 में अपने सैनिकों के लिए मिलिट्री सर्जनों को नौकरी पर रखना शुरू किया था।भारत में चिकित्सा सेवाओं की शुरुआत सन 1764 में हुई और बंगाल चिकित्सा सेवा का स्थापना किया गया। इसके बाद मद्रास और बंबई चिकित्सा सेवा सेवाएं सन 1767 और 1779 से शुरू हुआ। 

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वे सभी क्रमश बंगाल, मद्रास बंबई की तीन फ़्रेसीडेंसी सेनाओं को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराते थे। संयोग की बात है कि कोलकता में 18 वीं शताब्दी के अनेक ऐतिहासिक स्मारकों में एक प्रमुख भवन भी है जिसका सन 1757 में फोर्ट विलियम के लिए लॉर्ड क्लाइव ने एक सैनिक जनरल अस्पताल के रूप में डिजाइन तथा नियोजन किया था।

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कोलकाता में 246 आचार्य जगदीश चन्द्र बोस रोड, अलीपुर पर स्थित इस दो मंजिला ऐतिहासिक महल को सन 1870 में 60 बिस्तरों वाले सैनिक अस्पताल  दिया था। इस अस्पताल की आधारशिला स्वर्गीय फिल्ड मार्शल मानेकशॉ द्वारा पूर्व आर्मी कमांडर के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान रखा गया। यह प्राचीन पैतृक भवन अब सेना के बंगाल क्षेत्र का मुख्यालय है। 

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भारतीय सेना चिकित्सा कोर (एएमसी)

डाक्टरों, सर्जनों और नर्सिंग कर्मचारियों की प्रशंसा के लिए शब्द काम पड़ते है। यह कोर लम्बे समय से आज तक सैनिको की चिकित्सा सेवा कर रहा है। मार्च 1986 में कंपनी की सभी तीनो प्रेसीडेंसियों की चिकित्सा सेवाओं को संयुक्त करके भारतीय चिकत्सा सेवा (आईएमएस) बना दिया गया, जिसका काम मुख्य रूप से भरतीय सेना को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना था।

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प्रथम विश्व युद्ध तक भारतीय चिकित्सा सेवा का स्वरूप मुख्यतः सिविल था। 1939 में द्रितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद 3 अप्रैल सन 1943 को इसे भारतीय सेना चिकित्सा कोर नाम दिया गया। इंडियन आर्मी मेडिकल कोर को 3 अप्रैल 1943 को तीन सेवाओं, इंडियन मेडिकल सर्विस, इंडियन मेडिकल डिपार्टमेंट और इंडियन हॉस्पिटल कोर को समेकित करके बनाया गया।  

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स्वतंत्रता के बाद इंडियन आर्मी मेडिकल कोर का नामबदलकर आर्मी मेडिकल कोर यानि सेना चिकित्सा कोर कर कर दिया गया। सेना चिकत्सा कोर वर्तमान में देश की सशस्त्र सेनाओं को देशव्यापी स्तर पर उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाएं मुहैया करा है। आईएएमसी को 26 जनवरी 1950 से सेना चिकित्सा कोर (एएमसी) के रूप में पुनर्गठित किया गया।

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इसी वर्ष पहला पैराट्रूपर चिकित्सा दल भी गठित किया गया और पुणे में इससे सम्बन्धित कॉलेज की भी आधारशिला रखा गया। सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा (एएफएमएस) के अधीन देश भर में 127 अस्पतालों और 87 फिल्ड मेडिकल यूनिट काम करते है। एएफएमएस सेवारत सैनिकों, भूतपूर्व सैनिको और उनके परिवार को रोगो की रोकथाम, इलाज और पुनर्वास की व्यापक चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराता है।

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सेना चिकित्सा कोर का सेनाओं को युद्ध एवं शांतिकाल में, देश और विदेश में और दुर्गम इलाकों में चिकित्सा सेवा पहुँचाने का गौरवशाली इतिहास है।कोर पूरी निष्ठां और कौशल  2013 में उत्तराखंड में बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आम नागरिकों की की सेवा में अग्रणी रही है।

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सेना चिकित्सा कोर "सर्वे सन्तु निरामय" के आदर्श वाक्य पर कार्य करती है। चिकित्सा कोर के चिकित्सक, परिचारिका और पैरामेडिकल स्टाप सशस्त्र सेनाओं में तैनात है। यह इंटर सर्विस संगठन है जिसमे तक़रीबन 13200 चिकित्सक, परिचारिका अधिकारी पैरामेडिकल और करीब एक लाख सिविल स्टाप देश भर में कार्यरत है।

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आईएमएस  उल्लेखनीय नामों में भारत जन्मे एक ब्रिटिश सैनिक डाक्टर सर रोनाल्ड रॉस का नाम भी शामिल है। उन्हें मलेरिया के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए 1902 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मनित किया गया था। उस दौर में मलेरिया ने सेना के जवानों और अन्य नागरिको को बुरी तरह  प्रभावित किया था।

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सहायक सर्जन एस.सी.जी. चक्रवर्ती पहले भारतीय थे जिन्होंने 24 जनवरी 1855 को चिकित्सा सेवा में प्रवेश किया। आईएमएस में पहली महिला डॉक्टर को अप्रैल 1942 में कमीशन प्राप्त हुआ। वह पहली महिला थीं श्रीमती पुनीता अरोड़ा।

सेना में एक डॉक्टर मेजर लैशराम जतिन सिंह को काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर वर्ष 2010 में आंतकवादी हमले का मुकाबला करते हुए असाधारण साहस और शौर्य प्रदर्शन के लिए मरणोपरांत अशोक चक्र प्रदान किया गया। मेजर जतिन  सिंह ने अपना बलिदान देकर 10 सहयोगियों की जान बचाई थी।

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सेना के डाक्टरों, नर्सो और अर्द्ध-सैनिक चिकित्सकों  युद्धभूमि में और अन्यस्थानों पर असंख्य सैनिकों और परिवार को जीवन दान दिया है। रोजमर्रा के जीवन में अपने दैविक आचरण के कारण वे भी किसी बहादुर जवान के समान वीर रहे। 

बहादुरी के मामले में भी एएमसी सम्मान  पुरस्कारों में किसी से पीछे नहीं है। इस कोर के नाम अब तक एक अशोक चक्र, तीन महावीर चक्र, तीन कीर्ति चक्र, एक वर टू वीर चक्र, 20 वीर चक्र, 5 शौर्य चक्र, 5 उत्तम युद्ध सेवा मैडल, 3 पद्म भूषण और 4 पद्मश्री शामिल है। स्थापना दिवस के मौके पर सैनिक अस्पताल की ओर से विभिन्न आयोजन किये जाते है।

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